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बेटी कोंकणा को लेकर रेप की थीम पर फिल्म बना रही हैं अपर्णा सेन

-दिनेश ठाकुर
बांग्ला फिल्मकार अपर्णा सेन 'सारी रात' और 'सोनाटा' के बाद अपनी तीसरी हिन्दी फिल्म बना रही हैं। नाम रखा गया है- 'रेपिस्ट'। किसी रेप पीड़िता को मानसिक और सामाजिक स्तर पर किन यंत्रणाओं से गुजरना पड़ता है, फिल्म का फोकस इस पर रहेगा। अपर्णा सेन की बेटी कोंकणा सेन शर्मा नायिका होंगी। अर्जुन रामपाल और तनमय धनानिया को भी अहम किरदार सौंपे गए हैं। रितुपर्णो घोष की बांग्ला फिल्म 'तितली' में अपर्णा और कोंकणा साथ नजर आई थीं। मां-बेटी के रिश्तों पर यह अच्छी फिल्म है। इसमें मिथुन चक्रवर्ती भी हैं।

नारी देह की नुमाइश का बहाना

रेप को लेकर अपने देश में 'मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की' वाला मामला है। कानून सख्त होते गए। रेप के मामले नहीं थमे। सभ्य समाज आए दिन इनसे कलंकित होता है। ज्यादातर फिल्मकार इस गंभीर मसले को फिल्मों में मनोरंजन के दूसरे फार्मूलों की तरह पेश करते रहे हैं। रेप की थीम वाली फिल्मों में उन्हें नारी देह की नुमाइश का बहाना मिल जाता है। बी.आर. चोपड़ा जैसे दिग्गज फिल्मकार भी 'इंसाफ का तराजू' में इससे नहीं बच पाए। हॉलीवुड की 'लिपस्टिक' से प्रेरित इस फिल्म में पहले नायिका (जीनत अमान) और बाद में उसकी छोटी बहन (पद्मिनी कोल्हापुरे) पर फिल्माए गए रेप के लम्बे सीन से साफ हो गया था कि फिल्म बनाने वालों का मकसद रेप के खिलाफ युद्ध छेड़ना नहीं, कुछ और है।

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रेप पर उल्लेखनीय फिल्में
ऐसी फिल्में कम बनी हैं, जिनमें रेप का सीन संवेदनशील दर्शकों को तकलीफदेह लगा हो। जैसा हृषिकेश मुखर्जी की 'सत्यकाम' में लगा था। इस फिल्म में रेप का मकसद कहानी को नया मोड़ देना भर था। इसी तरह श्याम बेनेगल की 'निशांत' में रेप का प्रसंग सिर्फ जमींदार भाइयों के जुल्मों की हद दिखाने के लिए था। माणिक चटर्जी की 'घर' इस लिहाज से उल्लेखनीय फिल्म है कि यह शादीशुदा महिला से रेप के बाद उसकी और उसके पति की मानसिक हालत, उनके प्रति सामाजिक-पारिवारिक नजरिए को संवेदनाओं के धरातल पर टटोलती है। रेखा को संभावनाओं वाली अभिनेत्री के तौर पर पहली बार 'घर' से ही पहचाना गया।

'जख्मी औरत' ने सुझाया इंस्टेंट हल
राजकुमार संतोषी की 'दामिनी' भी रेप की थीम पर ठीक-ठाक फिल्म है। इसमें फोकस उन अड़चनों पर है, जो रेप पीड़िता को इंसाफ दिलाने के रास्ते में आती हैं। सनी देओल ने 'तारीख पे तारीख' वाला आक्रोश इसी फिल्म में दिखाया। डिम्पल कपाडिया की 'जख्मी औरत' बनाने वालों ने रेप के मसले का फिल्मी हल पेश किया। इस फिल्म में रेप पीड़ित महिलाएं डिम्पल कपाडिया की अगुवाई में टीम बनाती हैं। यह टीम रेप करने वालों को बारी-बारी से ऑपरेशन के जरिए नपुंसक बना देती है। फिल्म वाले गंभीर से गंभीर मसलों के ऐसे इंस्टेंट हल पेश करने में माहिर हैं। इस तरह की फार्मूलेबाजी, नारेबाजी और अति नाटकीयता के कारण ही फिल्में रेप के खिलाफ मजबूती से खड़ी नहीं हो पातीं।

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हमदर्दी का ढोंग ज्यादा
रेप पर बनी बाकी ज्यादातर फिल्मों में हमदर्दी का ढोंग किया गया। इन्हें बनाने वालों का निशाना कहीं और था। 'जख्मी औरत', 'बवंडर', 'आगाज', 'आज की आवाज', 'फूल और अंगार', 'जालिम' आदि इसी तरह की फिल्में हैं।



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